तहखाने का रहस्य
By: Sangeeta Singh
By: Sangeeta Singh
मानस ....मानस...…....कराहती दर्द भरी आवाज।
कौन.........? गहराती अंधेरी रात ,लैंप की हल्की रोशनी ।
मानस गहन एकाग्रता से अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लीन था,लेकिन अचानक ये आवाज जो उसका नाम पुकार रही, ने मानस की तल्लीनता को भंग कर दिया।
मानस उठकर आवाज की दिशा की ओर बढ़ा,लेकिन आवाज आनी बंद हो गई।
"क्या कोई बहुत मुसीबत में है,पर यहां कौन मेरा नाम लेकर पुकारेगा??"
मानस मन ही मन सोचने लगा,पढ़ाई से मन एकदम उचट गया।
मानस को अभी यहां आए महज चार पांच ही दिन बीते थे।इस हवेली को मानस ने बहुत सस्ते में किराए पर लिया था।
तीव्र बुद्धि के मानस ने आईएएस बनने के सपने देखे थे ,उसी की तैयारी के लिए वो छोटे शहर से दिल्ली आया था।
बड़े शहर में रहने की समस्या ज्यादा होती है इसके लिए उसने अपने एक दोस्त से संपर्क किया ,तो उसने उसे ये हवेली सस्ते में दिलवा दी।इस हवेली को कोई किराए में लेता नहीं था,बहुत सी कहानियां इस हवेली के बारे में प्रसिद्ध थी।
मानस के दोस्त ने समझाया , कि कभी कभी किसी प्रॉपर्टी को बिकने नहीं देने के लिए विरोधी झूठा प्रचार करा ,लोगों को डरा देते हैं,ताकि कोई ऐसी प्रॉपर्टी न खरीदे।
लेकिन ,हवेली देते समय वहां के मालिक ने बेसमेंट में बने एक कमरे की ओर इशारा कर ,उसे न खोलने की हिदायत दी थी ,उस कमरे में बहुत पुराना ताला लगा था।
यह हवेली वैसे तो सुनसान स्थान पर थी ,फिर भी कोचिंग सेंटर जाने में सिर्फ आधा घंटा ही लगता था।
मानस जी जान से परीक्षा की तैयारी में जुटा था ,इसलिए वह देर रात तक पढ़ाई करता था।
दो तीन दिन तक वह रहस्यमई आवाज ,नही सुनाई पड़ी,मानस ने भी उस आवाज को अपना वहम मान लिया ,और पूरे जी जान से अपनी पढ़ाई में जुट गया।
रात के करीब 3बजे थे ,अब मानस पढ़कर उठने ही वाला था,तभी वही कराहती आवाज फिर उसके कानों में टकराई,बाहर झांक कर देखा, घनघोर अंधेरा था,यदा कदा कुतों की भौंकने की तेज आवाज ,रात की नीरवता तोड़ देती थी।
यह आवाज तो बेसमेंट के कमरे से आ रही।मानस डर गया,उसे मकान मालिक की चेतावनी याद आ गई।किसी तरह उसने डर डरकर रात काटी।
ुबह देर से नींद खुली,दिन चढ़ आया था।जल्दी जल्दी काम निपटाया ,आज रविवार था, कोचिंग का ऑफ,मानस ने अपने दोस्त नीरज को फोन किया।
हैलो नीरज_यार तू मेरे घर आ जा। मानस ने कहा।
क्यों क्या बात है,इतना घबराया सा क्यों ह?,चल अभी 1घंटे में यहां के मशहूर दही भल्ले लेकर आता हूं,आज अवकाश का भरपूर आनंद लेते हैं।
अच्छा ,आ ,मैं भी तेरी मनपसंद वेज बिरयानी बना लेता हूं ।
लगभग 1घंटे में नीरज दही भल्ले के साथ ,मानस के सामने हाजिर था।
मानस का चेहरा मुरझाया था,उसने बीते कुछ दिनों और कल की बात नीरज को बताई|
नीरज भी गंभीर हो गया।दोनों उठकर बेसमेंट में गए ,वहां कमरे के दरवाजे के पास पहुंचे,बड़ा सा जंग लगा ताला , उन्हें मुंह चिढ़ा रहा था।
नीरज ने कहा ,"देख मानस डर कर तू पढ़ाई कर भी नहीं पा रहा। आज इस कमरे का ताला तोड़ रहस्य से पर्दा उठा ही लेते हैं , ,क्यों क्या ख्याल है तेरा?"
तू सही कहता है मेरे भाई ,यूं डर कर मैं पढ़ाई कर भी नहीं पा रहा हूं , घर परिवार को छोड़ जिस लक्ष्य के लिए आया हूं।
लेकिन मैं ताला तोड़ने की बात से सहमत नहीं हूं।तेरी नज़र में कोई चाभी बनाने वाला है क्या??
हम उससे इसकी दूसरी चाभी बनवा लेते हैं।
ठीक है ,मैं अभी ही चाभी वाले को बुला कर लाता हूं,यहीं कुछ दूर पर ही तो है।
खाना खा ,नीरज चाभी वाले को ले आया।चाभी वाला अगले दिन शाम तक चाभी बनाने की बात कह चला गया।
अगले दिन शाम तक जब चाभी वाला नही आया तो , दोनों दोस्त उसके घर पहुंच गए,वहां देखा तो नजारा कुछ और ही था।
हां का दृश्य देख, उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती है।चाभी वाले की मृत्यु हो चुकी थी, किसी ने उसे गला घोंट कर मार दिया था।"
उनके उम्मीद की किरण धूमिल हो रही थी कि अब दूसरे चाभी वाले को खोजना होगा,
पता नहीं उनके दिल के किसी कोने में एक विचार बार बार जन्म ले रहा था कि कहीं ,उस कमरे का संबंध इस ताले वाले की मृत्यु से तो नहीं है।
तभी चाभी वाले की छोटी सी बिटिया दौड़ती आई ,और एक चाभी उसने उनके हाथ में पकड़ा दिया कहा _,मेरे बापू ने इसे दिन में ही बना दिया था।
चाभी हाथ में लिए दोनो वहां से सीधे हवेली की तरफ चल दिए।
अभी ताला खुलने ही वाला था कि नीरज के घर से फोन आ गया, कि उसके पिता की तबीयत बहुत खराब है ,उसे तुरंत पहुंचना होगा।
नीरज फोन सुनते ही बिजली की रफ्तार से भागा और..... मानस ठगा सा ताले में चाभी लगाए देख विचार करता _, छोड़ दूं ,अकेले अंदर जाना ठीक नहीं,फिर कुछ निर्णय कर पाता कि ...... चर्र चर्र की आवाज करता हुआ दरवाजा अचानक खुल गया।
अब जाने के अलावा ,कोई रास्ता नहीं था।डरते डरते मानस अंदर गया। कमरा शायद सदियों से नहीं खुला था,घुप्प अंधेरा,सीलन की बदबू,मकड़ियों के जाले, चमगादड़ की भाग दौड़ ,अजीब सी आवाज .....वातावरण को रहस्यमई बना रहे थे।
लेकिन उस कमरे को देख कर ये अंदाज लगाया जा सकता था कि,कमरा पहले काफी सुसज्जित था ,वहां सोफा को धूल से बचाने के लिए कपड़े डाले हुए थे। थोड़ा आगे बढ़ने पर मानस ने देखा, एक जगह जमीन पर कुछ तंत्र क्रियाएं की गई थीं।
कमरा रहस्यमई होने के बावजूद भी कुछ अजीब नहीं लगा , तब मानस वहां से लौटने लगा।
तभी कमरे से आवाज आई मानस मानस....।
मानस ने सर पीछे की तरफ घुमाया ,ये आवाज तो ड्रेसिंग टेबल की तरफ से आ रही है।
वह बढ़ा,उसने ड्रेसिंग टेबल के उपर से कपड़ा हटाया ।एक वीभत्स पुरुष आकृति उसके आईने में दिखाई पड़ी। आवाज यहीं से आ रही थी।
मानस का शरीर डर से पीला पड़ गया।होंठ सूख रहे थे,जैसे अब उनसे खून टपक पड़ेगा।पैर और शरीर में सामंजस्य नहीं बैठ रहा था,उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।
तभी आईने से आवाज आई ,डरो नहीं मानस,मैं तुम्हारा कोई अहित नहीं करना चाहता ,तुम्ही मेरे मुक्तिदाता हो। तुमने मेरी मुक्ति की ओर पहला कदम बढ़ाया है,अर्थात इस द्वार को खोल कर।
मानस लड़खड़ाती आवाज में _का ..का.. कौन हो तुम? क्यों मेरे पीछे पड़े हो?जब से मैं यहां आया हूं तुमने मेरा जीना दूभर कर दिया है।
मानस शांत हो जाओ।मैंने कहा न मैं खुद ही पीड़ित हूं ,मैं तुम्हें क्या क्षति पहुंचाऊंगा?आईने में कैद उस व्यक्ति ने कहा।
तुम मुझसे क्या चाहते हो? और मैं तुम्हारी मदद क्यों करूं?_मानस में थोड़ी हिम्मत आई ,जो थोड़ी देर पहले तक सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था, उसने खुद को संयत किया।
पहले तुम मेरी कहानी सुन लो,फिर निर्णय मैं तुमपर छोड़ता हूं कि तुम्हें मेरी मदद करनी चाहिए या नहीं,अगर तुम मेरी मदद नहीं करोगे तो भी, मैं आगे से तुम्हें परेशान नहीं करूंगा।
मानस ने हामी भरी।आईने वाले पुरुष ने कहा ,यहां आईने के पास आओ ,मैं तुम्हें कुछ दिखाऊंगा।
मानस के पास अब विरोध करने का कोई कारण नहीं था।वह आईने के पास पहुंचा और आईने ने उसे अंदर खींच लिया।
मानस अब 100 साल पीछे पहुंच गया।हवेली के सामने एक बहुत सुंदर सजीला नौजवान दिखाई पड़ा।
मानस ने कहा_अरे, यह तो यही हवेली है,कितनी खूबसूरत है ,और वो नवयुवक क्या तुम हो ? कितने सुंदर और स्मार्ट थे।
हां,मानस ये मैं ही हूं मेरा नाम विवेक है।मेरे पिता बहुत बड़े जमींदार थे,हमारी बहुत साख थी।नौकर चाकर, आगे पीछे घुमा करते,धनदौलत की कोई कमी नहीं थे।बदकिस्मती से मेरी माता बाल्यावस्था में ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं।
पिता ने मेरी खातिर दूसरा विवाह नहीं किया,उन्हें डर था कि, कोई दूसरी स्त्री उन्हें पति का प्यार दे सकती है,लेकिन मेरे पुत्र को सगी मां का नहीं,इसलिए उन्होंने अकेले ही मेरे सहारे अपनी जिंदगी बिताने का निश्चय किया,उनकी पूरी दुनिया मेरे ही आस पास घूमती थी,मेरे मुंह खोलने भर से हर चीज मेरे सामने होती थी|
देश में स्वतंत्रता की मांग जोरों पर थी।हर युवा अपने देश की खातिर मर मिटने को तैयार था,लेकिन मेरा युवा मन तो रंगीनियों में खोया था।मैं युवावस्था की उस दहलीज पर था,जहां वासना ,सौंदर्य,हावी होता है।मैने अभाव नहीं देखा था,मैने अंग्रजों का जुल्म आम आदमियों पर जैसे होता था ,नही देखा था ,तो मुझमें देशप्रेम की भावना कहां जागृत होती।
मेरे लिए पिता जी ने विंटेज कार खरीदी थी,यह उस दौर में यह एकदम नई थी,विंटेज कारों का उत्पादन 1919से 1930के समय हुआ था। कुछ 4,5 कंपनियों ने ही विंटेज कार बनाई थी।
पिता ने फोर्ड कार मुझे कॉलेज आने जाने को दी थी।मैं पूरे शान से कॉलेज में कार से उतरता।मेरे जलवे देख लोग जलते थे।
एक दिन जब मैं फुल स्पीड में अपनी कार से कॉलेज से लौट रहा था,अचानक एक युवती टकराती बची,कार उसे छू कर आगे निकली,जिससे वह लड़खड़ा कर गिर गई,पैर में थोड़ी चोट आई ।
मैने कार पीछे मोड़ी,और उसके पास आया।
वो इतनी खूबसूरत थी कि मैं उसे एकटक निहारता ही रह गया।
वह लगातार मुझे गालियां दिए जा रही थी।पर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था,उसकी कजरारी मोटी मोटी आंखों से आंसू गिर रहे थे,लेकिन मुझे पता नहीं क्या हुआ मैं तो उसमें ही खोया था। अचानक जब एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा तब मैं जैसे नींद से जागा।
गुस्से से उसने मुझे दो तीन झापड़ रसीद कर दिए ,और बड़बड़ाती किसी तरह लंगड़ाती एक ओर चल दी।
अब मैं पूरे होश में था, मैं दौड़ते हुए उसके पीछे गया,और उससे क्षमा याचना की और अपने साथ कार में उसे घर छोड़ने की विनती की।
वह मान गई ,क्योंकि वो चल नहीं पा रही थी।
मैने खुशी खुशी उसे उसके घर छोड़ा।
अब तो रोजाना का नियम हो गया था, मालिनी का हाल पूछने के बहाने मिलने का।मैं और मालिनी अच्छे दोस्त बन गए।मालिनी का इस दुनिया में एक चचेरे भाई के अलावा कोई नहीं था।
धीरे धीरे दोस्ती को प्यार में बदलते समय नहीं लगा।
अब मेरा मालिनी के बिना रहना मुश्किल हो गया था।मैने पिता से बात की ,लेकिन पहले तो वो हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हुए ,फिर बाद में मेरे जिद के आगे झुक गए।
मालिनी ,मेरे दिल की मल्लिका ,दुल्हन बन कर हवेली में आ गई।धीरे धीरे घर की चाभी ,नौकरों पर सारा अंकुश मालिनी के हाथ में आ गई।
मेरा मधुमास अभी तक खत्म नहीं हुआ था, कि,
अब जमींदारी का कार्य पिता जी ने मुझे सौंप दिया ।
उसी के सिलसिले में मुझे दिन भर बाहर रहना होता,तो कभी अंग्रेजों को लगान का हिसाब देने जाना होता था।
अभी शादी के महीने ही बीते होंगे ,मालिनी का चचेरा भाई हमारे घर रहने आ गया।
मालिनी ने पुराने सारे नौकरों को हटा कर ,नए नौकर नियुक्त किए। मेरे पिता ने विरोध किया ,क्योंकि वो सब बहुत पुराने, और विश्वस्त नौकर थे,लेकिन मालिनी ने मुझे मना लिया और मैंने पिता जी को।
एक दिन ,जब मैं लौट कर आया पिता जी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो चुका था,उनकी आंखें बाहर को निकली हुई थी।
मालिनी दहाड़े मार कर रो रही थी,और उसका चचेरा भाई उसे ढांढस बंधा रहा था था।
मेरा तो जैसे सबकुछ खत्म हो गया था,पिता जी मेरी सांस थे। पिता जी के जाने के बाद मुझे बड़े बुरे बुरे ख्याल आते थे।
पूरे घर में पता नही क्यों एकदम मनहुसियत
का साया पांव पसारे हुए था।
मैं अवसाद में घिरता जा रहा था,लेकिन मालिनी अपनी दुनिया में व्यस्त थी।रोजाना अपने चचेरे भाई को लेकर बाहर जाती,देर रात तक लौटती,मैं कुछ बोलता तो वह मुझपर हावी हो जाती।मेरे उपर अंग्रेजों का बहुत दबाव था,समय पर लगान ,गांव वालों से लेकर अंग्रेजों को देना,कुछ रिश्तेदारों को नजर मेरे जमीन पर थी,उनसे भी निपटना।
एक दिन मालिनी मेरे पास एक पंडित (कम, तांत्रिक ज्यादा लग रहा था )को ले आई।उसने कहा, ये तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए पूजा पाठ करेंगे।
नीचे इसी तहखाने में अनुष्ठान शुरू हुआ,वह तांत्रिक एक छोटे से शीशे का मुंह बार बार मेरी ओर कर के कुछ कुछ मंत्र बोल रहा था।
अनुष्ठान खत्म होने के बाद ,मेरी(विवेक) तबियत ज्यादा ही खराब होने लगी।
अब मैं ज्यादा ही लेटा रहता था,धीरे धीरे घर ,कारोबार,हवेली सब कुछ की बागडोर मालिनी और उसके चचेरे भाई के हाथ में आ गई |
एक रात अचानक मेरी नींद प्यास के मारे खुल गई,मालिनी कमरे से नदारद थी। मैं उठकर पानी लेने किचन में गया,मुझे तहखाने की तरफ से जोर जोर से बात कर हंसने की आवाज सुनाई दी।
मैं दबे पांव सीढ़ियों से उतर तहखाने के दरवाजे के पास पहुंचा ,वहां मालिनी तांत्रिक और उसका चचेरा भाई आपत्तिजनक अवस्था में दिखे।
तभी मालिनी की आवाज आई, कितनी आसानी से उस रईसजादे को मूर्ख बना उसकी सारी दौलत हमलोगों ने हथिया ली।
और सब हंसने लगे।
चचेरा भाई हंस कर बोला_ सच में मालिनी तुम्हारा कोई जवाब नहीं,मैं और तुम भाई बहन की आड़ में उसके पीठ पीछे अय्याशी करते रहे और वह अंधा बना कुछ समझ ही नहीं पाया।
लेकिन उस बुड्ढे की नजर से हम बच ना सके,उसने हमें बेडरूम में रोमांस करते हुए देख लिया था ,और उसका खामियाजा उसे जान देकर चुकानी पड़ी।
तांत्रिक ने कहा , वाह क्या बात है!अब तो सारा कुछ मालिनी मेरी जान तुम्हारा ही है।
मालिनी ने आंखे गोल गोल घुमाते हुए , विजयी मुस्कान के साथ कहा ,वो तो है ही। और कहने लगी _अच्छा ही हुआ, बुड्ढा दिन रात हमारी हरकतों पर नजर रखे था,उस दिन तो हमारा भांडा फूट ही जाता,अगर उसका काम तमाम नही किया जाता।
तांत्रिक ने कहा _सही है ,अब वो विवेक ,(तुम्हारा पति) पूरी तरह कब्जे में है ।अब वो एक जिंदा लाश ही है।
बहुत देर तक मैने अपने आप को संयत किया था ,मेरी मुट्ठियां भिंच गईं थीं,अंदर जैसे बारूद फट रहा था,और उन सभी लोगों की बेहयाई हंसी देख, जब मैं खुद को काबू में नहीं रख पाया, तो मैंने अंदर प्रवेश किया। मुझे देख वे लोग चौंक गए।
लेकिन मालिनी निर्लज्ज बैठी रही ।मैने वहीं टंगी तलवार उठा ली,और मालिनी की ओर दौड़ा,_कुलटा ,लालची औरत मेरे प्यार में क्या कमी थी,तुझे मैने जी जान से प्यार किया था। अब मैंने जाना कि तू मेरे प्यार के लायक ही नहीं थी।अब मैं तुझे नहीं छोडूंगा।
अचानक एक गोली आई और मेरे सीने को पार कर गई। उसके (चचेरे भाई ,कहना अब रिश्ते का अपमान होगा ) आशिक ने रिवाल्वर निकाल मुझ पर गोली चला दी।
सब कुछ अप्रत्याशित था। मैं गिर पड़ा।
तांत्रिक चिल्लाया _अरे मूर्ख तूने इसकी हत्या कर दी।
मैने इसपर त्राटक कर रखा था,यह मेरे बस में था ,अब इसकी रूह यहीं रहेगी और ये हम तीनों को मार देगा।यह मर कर भी नहीं मरा।
ऐसा करो,तुम लोग हवेली से निकलने की तैयारी करो ,मैं इसे संभालता हूं।
जाओ जल्दी जाओ ,तांत्रिक चिल्लाया।
मालिनी और रंजीत (उसका भाई)जल्दी जल्दी सारे कागजात,गहने जेवरात बटोरने में लग गए।सब कुछ पा कर भी उन्हें हवेली छोड़नी पड़ रही थी।
कहते हैं न पाप से अर्जित की गई संपत्ति का उपभोग करना आसान नहीं है,वह धन संपत्ति किस काम कि, जिसे पाने के लिए कितनों का दिल दुखे और कितनों की लाशों से गुजरना पड़े।
वे हवेली छोड़ हरियाणा के रोहतक में बस गए,और तांत्रिक ने मेरी रूह इसी आईने में कैद कर दी। मैं इस आईने में कैद हूं और तब तक रहूंगा जब तक तांत्रिक के पास का वो छोटा शीशा किसी तरह टूट न जाए।
विवेक अपनी कहानी सुना चुप हो गया।
मानस ने कहा _मैं तुम्हारी मदद अवश्य करूंगा। बताओ मुझे क्या करना होगा??
विवेक ने कहा _बस तुम किसी तरह उन्हें इस हवेली तक ले आओ।
मानस ने कहा _जरूर।
फिर मानस को विवेक ने उस त्रिआयामी दुनिया से वापस भेज दिया।
मानस तहखाने में वापस आ चुका था।उसने दरवाजा बंद किया ,और वापस अपने कमरे में आ गया।
दो दिन बाद प्रतियोगी परीक्षा थी।वह पढ़ने में लग गया।परीक्षा देने के बाद उसने अपने दोस्त नीरज से संपर्क किया,और मकान मालिक का फोन नंबर देने को कहा, क्योंकि
नीरज भी मकान मालिक से नहीं मिला था,सिर्फ हिदायतें और चाभी ही एजेंट के माध्यम से नीरज को पकड़ाई गई थी।
नीरज ने एजेंट को फोन कर मकान मालिक का फोन नंबर लिया।
मानस ने फोन नंबर ,उधर से महिला की आवाज आई_कौन?
मानस ने कहा_हैलो मैं आपका किराएदार बोल रहा हूं।
मुझे आपसे जरूरी बात करनी है।
उधर से आवाज आई _ क्यों?
मानस ने नम्रता से जवाब दिया_ऐसा है मैडम कि , मैं आपकी यह हवेली खरीदना चाहता हूं।
परंतु मैं ये हवेली नहीं बेचना चाहती_मालिनी ने उधर से कहा।
मैडम मैं आपको हवेली के 10करोड़ दूंगा।
उधर पीछे से मानस को एक पुरुष आवाज आई, किससे बात कर रही हो,डार्लिंग।
मालिनी ने थोड़ी देर में मानस को फोन करने को कहा।
सुनो ,रंजीत वो किराएदार हवेली खरीदना चाहता है_मालिनी ने कहा।
रंजीत ने कहा मालिनी पागल हो गई हो,तहखाना भी तो हवेली में ही आता है,अगर उसने खोला तो कई दफन राज बाहर आ जायेंगे।
लेकिन रंजीत ,हवेली बेकार पड़ी है,कोई किराए में भी नही लेता था,हम उसमें रह नही सकते।अगर ये बिक जाए तो हमारे लिए अच्छा हो जाएगा।
और 10करोड़ मिल भी रहा है,सौदा बुरा तो नहीं।
और तहखाने का मैने सोच लिया है,हम उस भाग को नहीं देंगे।वो हिस्सा हमारे कब्जे में ही रहेगा।
रंजीत ने कहा ,अरे वाह खूबसूरती और दिमाग में तुम्हारा कोई जवाब नहीं।
मालिनी ने इस बार खुद मानस को फोन मिलाया।
(मानस इंतजार ही कर रहा था,उसे पता था कि जो चारा उसने फेंका है,उसमें ये चिड़िया जरूर फंसेगी।,और ऐसा ही हुआ।)
मालिनी _हैलो ,मानस जी बोल रहे,हमें सौदा मंजूर है,लेकिन मुझे हवेली के 12 करोड़ चाहिए और नीचे तहखाने का हिस्सा हमें नहीं बेचना।
मानस ने फिर चाल चली ,उसने और भी रुपए बढ़ा दिए,उसने कहा 14करोड़ लीजिए और ये हवेली पूरी तरह मेरे हवाले कर दीजिए।
मालिनी लालच में आ गई।उसने कहा हमें कल तक का समय चाहिए ,सोचने का ।
मानस ने कहा कोई बात नहीं,आराम से सोच लीजिए।
मालिनी ,शेखर और तांत्रिक तीनों मिल कर विचार विमर्श करते हैं ,बाद में फैसला होता है कि हवेली का कागज तैयार करवा ,मानस को यहीं बुला लेते हैं ,हम में से कोई हवेली नहीं जाए।
अगले दिन मालिनी को फोन कर ये कहा कि ,आप यहीं आ जाओ ,हम हवेली के पेपर साइन कर आपको यहीं हमारे घर (रोहतक में वो लोग रहते थे)पर दे देंगे।
मानस ने कहा _लगता है ,आपलोगों को सौदा मंजूर नहीं है , वरना इतनी शर्तें न रखते।
मैं अभी यहां से कहीं नहीं जा सकता ,क्योंकि कभी भी मुझे परीक्षा ,या इंटरव्यू के लिए बुलाया जा सकता है ,मानस ने कहा।
काफी न नुकुर के बाद मालिनी आने को तैयार हो गई।
मानस की योजना कुछ हद तक पूरी होती दिख रही थी।
मालिनी , रंजीत और तांत्रिक तीनों आए।वो तीनों काफी बूढ़े हो चुके थे,लेकिन चालबाजी उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी।पहले उन्होंने अंदर आने से मना कर दिया।
फिर मानस के जोर देने पर मालिनी ,रंजीत तो अंदर आ गए ,लेकिन तांत्रिक बाहर ही रुका रहा।
मानस ने उनका बहुत अच्छे से सत्कार किया ,मानस बहुत वाकपटु था।बातों बातों में वो उनलोगों को तहखाने तक ले गया।
मालिनी ने देखा , कमरे में ताला लगा है ,उसने चैन की सांस ली।मानस ने उस कमरे की चाभी मांगी ।मालिनी ने कहा ,इसकी चाभी तो खो गई है ,और इस कमरे को अच्छा होगा आप न ही खोलें।
इधर उनकी आंख बचा कर मानस ने दरवाजे का ताला खोल दिया।\
चानक एक धूल भरी आंधी आई और उन दोनो को अंदर खींच ले गई।
वो दोनो चिल्लाने लगे,बचाओ बचाओ,तांत्रिक दौड़ा दौड़ा आया ।
उसने देखा शीशे से दो हाथ निकल उनकी गर्दन दबा रहा था।
तांत्रिक ने तुरंत अपने पास से वह छोटा शीशा निकाला ,जिससे उसने त्राटक किया था ।वह तेज तेज मंत्र पढ़ने लगा ,जिससे उस हाथ की पकड़ ढीली हो गई।
मानस को अचानक क्या सूझा ,उसने एक लाठी तांत्रिक के शीशे की ओर,दे मारा ,निशाना सही लगा ,शीशा नीचे गिर कर चकनाचूर हो गया।
अब विवेक उस ड्रेसिंग टेबल के शीशे से आजाद हो गया।उसने तीनों को मार दिया , तीनों राख में बदल गए,और इस तरह विवेक का बदला पूरा हुआ।
मानस को धन्यवाद कह ,विवेक भी गायब हो गया,जैसे वहां कुछ हुआ ही नहीं था।