विश्वविजेता मिर्च
By: Nayan Chanda
By: Nayan Chanda
सूरज अभी-अभी अप्पू के घर के चारों ओर खड़े नारियल, आम और चीकू के पेड़ों के झुरमुट के पीछे डूबा था। आसमान पर अभी भी गुलाबी झलक फैली थी। बैंगन, टमाटर और घिया की बाड़ी में अभी भी मद्धिम रोशनी थी।
चिड़ियों के झुण्ड उड़ते हुए अपने घोसलों को जा रहे थे। अप्पू की माँ रात के खाने के लिए मछली बना रही थीं और उन्हें कुछ ताज़ी हरी मिर्चें चाहिए थीं। बारह बरस का अप्पू कुछ बढ़िया, चमकीली हरी मिर्चें तोड़ने बगीचे में गया ही था कि उसने एक भारी आवाज़ सुनी, "मुझे बहुत खुशी है कि तुम्हारे परिवार को मेरी मिर्चें अच्छी लगती हैं।"
अप्पू के रोंगटे खड़े हो गए, वह पीछे मुड़ कर देखने लगा कि उसके पीछे चुपके-चुपके कौन चला आया है।भारी लेकिन प्यार भरी आवाज़ उसे अपने घुटनों तक ऊँचे, पत्तियों से लदे मिर्च के पौधे से आती लग रही थी।
"डरो मत, मैं अहर उचू हूँ, मिर्चों का देवता," आवाज़ आई, "तुम पौधों को हर शाम पानी देते हो, और उनकी देखभाल करते हो। इतने प्यार और देखभाल से मैं बहुत खुश हूँ। मैं अपने घर से हज़ारों मील दूर हूँ, इसलिए तुम से मिली देखभाल मेरे लिए बहुत मायने रखती है।"
पौधे से आने वाली आवाज़ को सुन कर अप्पू कुछ देर तो सन्न रह गया। फिर ज़रा सम्भल कर अप्पू ने पूछा, "तुम कहाँ से आए हो?"
"दूर, बहुत दूर दक्षिणी अमेरिका से। ठीक-ठीक कहें तो मैक्सिको से," अहर उचू ने कहा।
अप्पू को बिलकुल भी अन्दाज़ा नहीं था कि दक्षिणी अमेरिका कहाँ था। इससे पहले कि वह कुछ और पूछ पाता माँ रसोईघर से चिल्लाई, "अप्पू
मेहरबानी करके ज़रा जल्दी से मिर्चें ले आओगे क्या?" अहर उचू बोला, "मुझे लगता है कि अभी तुम्हें जाना चाहिए। कल फिर आना, मैं तुम्हें
अपने भारत आने और सारी दुनिया तक पहुँचने की यात्रा के बारे में बताऊँगा। लेकिन तुम हमारी बातचीत के बारे में किसी को मत बताना।" अहर
उचू की बातों से अभी भी हैरत में डूबे अप्पू ने सिर हिलाया और घर की ओर भाग गया।
पिछवाड़े की बाड़ी का छोटा सा पौधा इतनी दूर मैक्सिको से आया है! "मिर्चें लाने में तुम्हें इतनी देर क्यों लगी?" माँ पूछ रही थीं। अप्पू को अहर
उचू की कही बात याद आ गई। "अरे ... मुझे न पौधे में बहुत ज़्यादा टमाटर लगे दिखे। पिछली बार से बहुत ज़्यादा ... " उसने बात बनाई। ख़ैर, उसे
बाद में पता चलने वाला था कि टमाटर का पौधा भी मिर्च की ही तरह मैक्सिको से आया है।
हैरत से भरा अप्पू मछली चखने के लिए भी नहीं रुका। वह दौड़ कर अपने कमरे में गया और अपने पिछले जन्मदिन पर उपहार में मिला छोटा सा ग्लोब उठा कर देखने लगा कि दक्षिणी अमेरिका कहाँ है।
दक्षिणी अमेरिका ग्लोब के दूसरी तरफ़ मिला। उसने जल्दी से अहर उचू का बताया देश ढूँढ निकाला, मैक्सिको। 'कमाल है!' अप्पू ने सोचा।
शाम के इन्तज़ार में अप्पू का अगला दिन बड़ी मुश्किल से बीता। उसने बड़े बेमन से अपनी कक्षा में पढ़ाई की, शाम को अपना गृहकार्य भी जल्दी से खत्म कर लिया। उसके दिलोदिमाग में बस एक ही ख़याल छाया था - बोलने वाला पौधा।
सूरज के डूबने से पहले ही उसने पौधे सींचने वाला झारा भरा और बगीचे की ओर चल दिया। मिर्च के पौधे के पास आने से पहले उसने बैंगन, पालक, टमाटर के पौधों और घिया की बेलों को पानी दिया।
अप्पू ने झारा चमकीली मिर्चों से लदे पौधे पर खाली किया ही था कि अहर उचू बोल उठा,"आह! दिनभर की गर्मी के बाद कैसा सुकून मिला! धन्यवाद अप्पू।"
उत्सुकता से भरा अप्पू कहानी सुनने के लिए उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। अहर उचू ने बात शुरू की, "हज़ारों साल पहले, दक्षिण अमेरिका के दूर- दूर तक फैले हुए पहाड़ों और जंगलों में इन्का देवताओं का राज था। उन्होंने वहाँ रहने वाले लोगों की मदद के लिए चार भाइयों को भेजा। इन्का लोग मक्का, आलू, अवोकाडो (नाशपाती जैसा फल) टमाटर और बहुत से फल और सब्ज़ियाँ उगाते थे। लोगों की ज़िन्दगी को ज़रा चटपटा बनाने के लिए भेजे गए चार भाइयों में से एक अहर उचू था।"
उसकी आत्मा मिर्च के पौधे में बस गई जो सबसे ज़्यादा पसन्द किया जाने वाला फल बन गया। "हाँ," आवाज़ ने हैरान से अप्पू को बताया, "मिर्च असल में एक फल है, जबकि तुम लोग समझते हो कि यह सब्ज़ी है। वैसे यह दूसरे फलों की तरह मीठी नहीं है, इसमें बीज होते हैं जिनसे नए पौधे उगते हैं।
इसी वजह से अहर उचू की आत्मा लगातार जीवित रहती है। मक्की के आटे और टमाटर से बने सादा स्वाद वाले भोजन को चटपटा बनाने वाले मसाले के रूप में मिर्च बहुत प्रसिद्ध हो गई। राजा ने माँग की कि एज़्टेक और इन्का लोग राजा के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए, कर के रूप में उसे पकी हुई और सूखी मिर्चें भेंट किया करें।"
"कर क्या होता है?" अप्पू ने पूछा।
"कर यानी टैक्स जो लोग राजा को देते हैं," अहर उचू ने समझाया।
"यह सब तो बड़ा ही मज़ेदार है," अप्पू बीच में ही बोल उठा, "लेकिन तुम अपने देश से भारत तक कैसे पहुँचे?"
अप्पू ने ग्लोब में देखा था कि भारत और मैक्सिको के बीच बहुत बड़े महासागर और अफ़्रीकी महाद्वीप मौजूद हैं। अहर उचू ने बताया, "यह एक लम्बी कहानी है। जो लोग हमारे पूर्वजों की धरती पर आए थे और जिन्होंने मिर्च के पौधे को पूरी दुनिया तक पहुँचाने में मदद की, वे असल में भारत जाने का रास्ता खोजते हुए वहाँ पहुँचे थे।
लगभग पाँच सौ बरस पहले की बात है, एक दिन स्पेन के राजा और रानी द्वारा भेजे गए तीन व्यापारिक जहाज़ हमारे यहाँ आ पहुँचे। इटली के वासी क्रिस्टोफ़र कोलम्बस की अगुवाई में जहाज़ों के इस बेड़े ने यह सोच कर एटलांटिक महासागर में प्रवेश किया था कि यहाँ से उन्हें भारत जाने का कोई छोटा रास्ता मिल जाएगा।
उन्होंने सोचा ही नहीं था कि उनकी राह में विशाल अमेरिकी महाद्वीप और प्रशान्त महासागर खड़े होंगे।" "वे भारत क्यों आना चाहते थे?" अप्पू ने पूछा। अहर उचू हँसा, "क्योंकि काली मिर्च, जिसे यूरोप के अमीर लोग अपने खाने में डालना बेहद पसन्द करते थे, भारत में ही उगती थी।
कोलम्बस अपने साथ कुछ काली मिर्च भी लाया था ताकि लोगों को दिखा सके कि वह क्या खोज रहा है। उसे पूरा विवास था कि वह भारत या इंडिया पहुँच गया है और इसलिए उसने एज़्टेक, इन्का और हमारे यहाँ के सभी लोगों को इंडियन या भारतीय कहा।"
"अच्छा, तो रैड इंडियन अमेरिका के मूलवासी हैं!" अप्पू ने हैरानी से कहा। वह अपनी खोज से हैरान भी था और खुश भी। "कोलम्बस बहुत ही निराश हुआ कि उन भारतीयों के पास बेचने के लिए काली मिर्च नहीं थी।
लेकिन उन्होंने उसे मिर्चों की कई किस्में दिखाई जिन्हें वे उगाते थे। कोलम्बस ने उन्हें चखा और पाया कि यह मिर्चें भी भारतीय मिर्चों जितनी ही तीखी हैं। उसने उस
छोटे से फल को मिर्च कहा और उन्हें स्पेन ले जाने के लिए बोरों में भर लिया।" अप्पू को यह सोच कर बड़ा ही मज़ा आया कि कोलम्बस जो असल में काली मिर्च लेने के लिए आया था, हरी और लाल मिर्च घर ले गया!
अगले दिन अप्पू ने बाड़ी की सिंचाई करने के बाद अहर उचू को पुकारा। अहर उचू बोला, "ओह! मुझे तुम्हें 'खोज के युग' के बारे में कुछ और बातें भी बतानी चाहिएँ।"
उसकी बात सुन कर अप्पू बहुत रोमांचित हुआ, उसे लगा जैसे वह किसी नए किस्म के कम्प्यूटर गेम का हिस्सा बन रहा है। उसके मन में दुनिया का एक धुँधला सा नक्शा आकार लेने लगा और उस में पुर्तगाल और स्पेन और उनके महासागरी बन्दरगाह जगमगाने लगे।
अहर उचू ने बात आगे बढ़ाई, "दो हज़ार साल पहले से यूरोप के लोग भारतीय काली मिर्चों के दीवाने थे। रोमन साम्राज्य के समय से अमीर लोग माँस के पकवानों में काली मिर्च की खुशबू पसन्द करते थे और चुटकीभर मसाले के लिए ऊँची कीमत देने को तैयार रहते थे।
काली मिर्च खरीदने के लिए जाँबाज़ अरब और ग्रीक नाविक, अरब सागर को पार करके केरल आते थे। साथ लाए सोने के सिक्कों और अन्य सामान के बदले ली काली मिर्च यूरोप में अमीरों को बेच कर वे ज़बर्दस्त फ़ायदा कमाते थे।"
पुर्तगालियों और स्पेन के लोगों ने समुद्री यात्रा करने में समर्थ जहाज़ और समुद्री यात्रा में काम आने वाले उपकरण बनाए जिन्होंने उनके लिए महासागरों में यात्रा करना आसान बना दिया और वे अटलांटिक महासागर से होते भारत पहुँचने लगे।
क्रिस्टोफ़र कोलम्बस अमेरिका (१४९२) पहुँचा और वास्को ड गामा भारत (१४९८)। शुरु में उन्होंने व्यापारिक अड्डे बनाए और बाद में धीरे-धीरे पूरे ही देशों को चालाकी और हथियारों के बल पर उपनिवेश बना लिया।
कृषि और खनिज संसाधनों से सम्पन्न इलाकों पर आधिपत्य की होड़ में जुटे यूरोप के अन्य देश-ब्रिटेन, हॉलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस, डेनमार्क और इटली- दुनिया में अपने-अपने उपनिवेश बनाने में लगे हुए थे।
ईसाई देशों के बीच झगड़े न होने पाएँ इसलिए पोप ने ग्लोब पर एक काल्पनिक रेखा भी खींच दी थी ताकि इसके एक ओर स्पेन अपना आधिपत्य जमा सके और दूसरी ओर पुर्तगाल।
लेकिन उपनिवेश बसाने के हंगामे में ब्रिटेन और हॉलैण्ड के शामिल होने के बाद इस रेखा की अनदेखी हुई। १९४७ में आज़ादी पाने तक भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य की मुकुटमणि था।