Notifications

No new updates

Welcome to LeafyReads! 🌿 Discover new books...

ago

Create Your Account

Already have an account? Sign in
Funny loading GIF Google icon Continue with Google

Support LeafyReads

Your contributions help us keep the library free and support rising authors.

By clicking "signup" you agree to our Terms of Service & Privacy Policy.
Loading...

Unfolding stories, please wait...

Start Reading Now

कहानी का सारांश (Plot Outline): शिमला की वादियों में मशहूर उद्योगपति 'विक्रम सिंह' की उनके ही फार्महाउस में हत्या हो जाती है। कमरा अंदर से बंद था और बाहर ताजी बर्फ पर कोई पैरों के निशान नहीं थे। इस केस को सुलझाने के लिए दिल्ली से सस्पेंडेड पुलिस अफसर कबीर को बुलाया जाता है, जिसका इस शहर से एक गहरा और दर्दनाक अतीत जुड़ा है। क्या कबीर कातिल को ढूंढ पाएगा, या वह खुद शिकार बन जाएगा?

 

अध्याय 1: खामोश चीख (Chapter 1: The Silent Scream)

शिमला की रात हमेशा की तरह सर्द थी, लेकिन आज हवा में कुछ अलग ही कड़वाहट घुली हुई थी। दिसंबर की 24 तारीख। बाहर बर्फ गिर रही थी, जैसे आसमान खुद इस शहर के गुनाहों को सफेद चादर से ढकने की कोशिश कर रहा हो।

'विक्रम विला' एक पुराना, अंग्रेजों के ज़माने का बना हुआ बंगला था, जो शहर के शोर-शराबे से दूर, घने देवदार के जंगलों के बीच अकेला खड़ा था। रात के 2 बज रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि गिरती हुई बर्फ की आवाज़ भी सुनी जा सकती थी।

अचानक, विला के पहली मंजिल के एक कमरे से कांच टूटने की तेज आवाज़ आई।

छन-पाक!

नीचे चौकीदार, रामू, जो अंगीठी के पास ऊंघ रहा था, हड़बड़ा कर उठ गया। "साहब?" उसने डरते हुए आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं आया। बस, जंगल से आती हुई हवा की सांय-सांय। रामू ने अपनी लाठी उठाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। उसके पुराने घुटने हर सीढ़ी पर चटक रहे थे, लेकिन डर ने उसे जकड़ रखा था।

विक्रम सिंह के कमरे का दरवाज़ा बंद था। रामू ने कांपते हाथों से दरवाज़ा खटखटाया। "मालिक? सब ठीक है?"

सन्नाटा।

रामू ने हैंडल घुमाया। दरवाज़ा अंदर से लॉक था। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर कंधा दरवाज़े पर मारा। एक बार, दो बार... और तीसरी बार में पुरानी लकड़ी चटक गई। दरवाज़ा खुला और रामू अंदर गिरा।

जैसे ही उसने नज़र उठाई, उसके हलक से एक चीख निकलकर वहीँ जम गई।

सामने की दीवार पर खून के छींटे थे। कमरे की बड़ी खिड़की टूटी हुई थी और ठंडी हवा अंदर आ रही थी। और बीचों-बीच, अपनी महंगी लेदर की कुर्सी पर विक्रम सिंह बैठे थे—या यूँ कहें, उनकी लाश बैठी थी। उनकी गर्दन एक अजीब कोण पर मुड़ी हुई थी और आँखों में ऐसा खौफ था, जैसे उन्होंने मौत को साक्षात् देख लिया हो।

रामू पीछे हटा, उसका पैर किसी चीज़ से टकराया। उसने नीचे देखा। वह एक पुराना, धूल जमा हुआ 'म्यूजिक बॉक्स' था, जिसमें से एक धीमी, डरावनी धुन बजनी शुरू हो गई थी।

रामू ने कांपते हाथों से अपनी जेब से फोन निकाला और 100 नंबर डायल किया। उसकी सांसें फूल रही थीं। "हेलो... पुलिस? खून... यहाँ खून हुआ है! विक्रम विला में... साहब मर गए!"

दिल्ली में, कबीर अपने छोटे से फ्लैट की बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था। रात के 3 बज चुके थे, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। पिछले 6 महीनों से, जब से उसे सस्पेंड किया गया था, रातें उसके लिए सबसे बड़ी दुश्मन बन गई थीं।

तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर नाम फ्लैश हुआ—IG माथुर।

इतनी रात को IG का फोन? कबीर ने सिगरेट बुझाई और फोन उठाया। "जय हिंद सर।"

"कबीर, पैकिंग कर लो," माथुर की आवाज़ गंभीर थी, उसमें आदेश और विनती दोनों का मिश्रण था।

"सर? मैं सस्पेंडेड हूँ," कबीर ने रूखेपन से कहा।

"मुझे पता है। लेकिन यह केस ऑफ-द-रिकॉर्ड है। शिमला में विक्रम सिंह का मर्डर हुआ है। लोकल पुलिस इसे संभाल नहीं पाएगी। और... जिस तरीके से मर्डर हुआ है, वह साधारण नहीं है।"

कबीर ने शिमला का नाम सुनते ही अपनी मुट्ठी भींच ली। शिमला—वह शहर जहाँ उसने अपना सब कुछ खोया था। "मैं वहां नहीं जा सकता सर। आप जानते हैं क्यों।"

"कबीर," माथुर की आवाज़ नरम हुई। "वहां से जो शुरूआती रिपोर्ट मिली है, उसमें एक चीज़ का ज़िक्र है। मौका-ए-वारदात पर एक सिंबल मिला है। एक काली तितली (Black Butterfly) का निशान।"

कबीर का खून जम गया। काली तितली। वही निशान जो 5 साल पहले उसकी पत्नी की हत्या वाली जगह पर मिला था। वह सीरियल किलर जिसे मरा हुआ मान लिया गया था।

"गाड़ी आधे घंटे में नीचे होगी," माथुर ने कहा और फोन काट दिया।

कबीर ने अंधेरे में घूरते हुए फोन को टेबल पर रखा। उसका अतीत, जिसे वह दफन कर चुका था, अपनी कब्र से बाहर निकल आया था। उसने अपनी अलमारी खोली और अपनी पुरानी रिवॉल्वर निकाली।

शिमला अब सिर्फ एक हिल स्टेशन नहीं था। अब वह एक कुरुक्षेत्र था। और यह युद्ध सिर्फ एक कातिल को पकड़ने का नहीं, बल्कि अपने ही साये से लड़ने का था।

गाड़ी की हेडलाइट्स ने कोहरे को चीरा और कबीर ने एक लंबी सांस ली। खेल शुरू हो चुका था।

 

 

अध्याय 2: बंद कमरे का रहस्य (Chapter 2: The Mystery of the Locked Room)

 

अगली सुबह, शिमला एक सफ़ेद चादर में लिपटा हुआ था। कबीर जब 'विक्रम विला' पहुंचा, तो वहां पहले से ही पुलिस की गाड़ियां मौजूद थीं। लोकल इंस्पेक्टर राणा उसे देखते ही मुंह बनाने लगा। राणा और कबीर की पुरानी रंजिश थी।

"अरे, तो दिल्ली वाले साहब आ ही गए," राणा ने तंज कसा। "सुना है आजकल घर पर बैठे हो?"

कबीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और सीधे क्राइम सीन की तरफ बढ़ा। "लाश कहां है?"

"पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई," राणा ने कहा, कबीर के पीछे-पीछे आते हुए। "लेकिन कमरा वैसे ही सील है।"

कबीर ने कमरे में कदम रखा। खून की गंध अभी भी हवा में थी। उसने कमरे का मुआयना शुरू किया।

दरवाज़ा: अंदर से लॉक था। रामू ने इसे तोड़ा था।

खिड़की: टूटी हुई थी। लेकिन खिड़की के नीचे, बाहर ज़मीन पर ताज़ी बर्फ थी। अगर कोई खिड़की से कूदता, तो बर्फ पर निशान ज़रूर होते। लेकिन वहां कोई निशान नहीं थे।

चिमनी: इतनी संकरी कि कोई बच्चा भी नहीं आ सकता।

"राणा," कबीर ने खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा, "कल रात बर्फ कब गिरनी शुरू हुई थी?"

"शाम को 7 बजे से लगातार गिर रही थी," राणा ने जवाब दिया। "हत्या रात 2 बजे के आसपास हुई। अगर कातिल बाहर से आता या जाता, तो बर्फ पर पैरों के निशान ज़रूर होते। लेकिन घर के चारों तरफ की बर्फ एकदम साफ है।"

"यानी कातिल हवा में उड़कर आया और उड़कर चला गया?" कबीर ने व्यंग्य किया।

वह विक्रम सिंह की मेज के पास गया। वहां एक डायरी रखी थी, जो खुली हुई थी। लेकिन पन्ने कोरे थे। कबीर ने गौर से देखा। पन्ने पर पेन की नोक के निशान थे, जैसे किसी ने कुछ लिखा हो लेकिन स्याही नहीं चली।

"पेंसिल है?" कबीर ने पूछा। एक हवलदार ने उसे पेंसिल दी। कबीर ने पन्ने पर हल्के हाथ से पेंसिल रगड़ी (Shading)। धीरे-धीरे, कागज पर दबे हुए शब्द उभरने लगे।

वहाँ सिर्फ एक शब्द लिखा था: "वह लौट आया है।" (He has returned).

तभी कबीर की नज़र कोने में पड़ी एक छोटी सी चीज़ पर गई। दीवार पर खून के छींटों के पास, बहुत बारीक नक्काशी की हुई एक छोटी सी काली तितली बनी हुई थी। यह पेंट नहीं था, इसे दीवार पर उकेरा गया था।

कबीर के दिमाग में फ्लैशबैक कौंध गया। उसकी पत्नी, रिया, का खून से लथपथ चेहरा।

"सर!" हवलदार की आवाज़ ने उसे वर्तमान में खींचा। "चौकीदार रामू को होश आ गया है। वह कुछ बड़बड़ा रहा है।"

कबीर तुरंत नीचे दौड़ा। रामू एक कंबल में लिपटा कांप रहा था। "रामू, कल रात तुमने क्या देखा?" कबीर ने सख्ती से पूछा।

Page 1 of 5