उसने कहा था
(एक)
बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें।
जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं,
कभी उनके पैरों की उँगलियों के पोरों को चींथकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं,
तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर “बचो खालसा जी”, “हटो भाई जी”, “ठहरना भाई”, “आने दो लाला जी”, “हटो बाछा”—कहते हुए सफ़ेद फेंटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने, खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं।
क्या मजाल है कि “जी” और “साहब” बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती है।
यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं—हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमाँवालिए; हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा लंबी वालिए।
समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?—बच जा।
ऐसे बंबूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले।
उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
“तेरे घर कहाँ हैं?”
“मगरे में और तेरे?”
“माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है?”
“अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।”
“मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बाज़ार में हैं।”
इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले।
कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकराकर पूछा— “तेरी कुड़माई हो गई?” इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।
दूसरे-तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, दूध वाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते।
महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, “तेरी कुड़माई हो गई?” और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला।
एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली—”हाँ, हो गई।”
“कब?”
“कल; देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।”
लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उँड़ेल दिया।
सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई—तब कहीं घर पहुँचा।
(दो)
“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खंदकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेह और बरफ़ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं।
ज़मीन कहीं दिखती नहीं,—घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज़ धरती उछल पड़ती है।
इस गैबी-गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का ज़लज़ला सुना था, यहाँ दिन में पचीस ज़लज़ले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफ़ा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।”
“लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खंदक में बिता ही दिए। परसों ‘रिलीफ़’ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फ़िरंगी मेम के बाग़ में—मख़मल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।”
“चार दिन तक एक पलक नहीं झेंपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटूँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो।
पाजी कहीं के, कलों के घोड़े संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था—चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था।
पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, “नहीं तो—”
“नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों?” सूबेदार हज़ारासिंह ने मुसकराकर कहा— ‘लड़ाई के मामले जमादार या नायब के चलाए नहीं चलते। बड़े अफ़सर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ़ बढ़ गए तो क्या होगा?”
“सूबेदार जी, सच है,” लहनासिंह बोला- “पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है।
सूर्य निकलता नहीं, और खाई में दोनों तरफ़ से चंबे की बावलियों के-से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए, तो गरमी आ जाए।”
“उदमी उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। लहनासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाज़े का पहरा बदल दे।” यह कहते हुए सूबेदार सारी खंदक में चक्कर लगाने लगे। वजीरासिंह पलटन का विदूषक था।
बाल्टी में गँदा पानी भरकर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला- “मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए।
लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भरकर उसके हाथ में देकर कहा- “अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।”
“हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा ज़मीन यहाँ माँग लूँगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।”
“लाड़ी होराँ को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फ़िरंगी मेम-”
“चुपकर। यहाँ वालों को शरम नहीं।”
“देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तंबाकू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं।”
“अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है?”